मंगलवार, 1 मई 2012

एक दिन मन्‍ना डे

कल दो-तीन मित्रों ने याद दिलाया कि एक मई मन्‍ना डे का जन्‍म दिन है और वे इस कहानी को पढ़ना चाहते हैं। 
किंचित देरी से ही सही, यह कहानी यहॉं पोस्‍ट कर रहा हूँ,शायद कुछ और लोगों की दिलचस्‍पी भी हो।


कहानी
एक दिन मन्ना डे

छियासी बरस के मन्ना डे उस दिन शहर में आए थे। जीवनकाल में ही अमर हो चुके अपने अनेक गीतों को गाने के लिये। कार्यक्रम का ज्यादा प्रचार नहीं हुआ लेकिन धीरे-धीरे खबर फैलती गई कि मन्ना डे शहर में आज गाना गाएँगे। आमंत्रण पत्र से प्रवेश था। फिर भी रवीन्द्र भवन पूरा भर चुका था। सीढि़यों पर, गैलरी में, रास्ते में लोग बैठे हुये थे या खड़े थे। सब उम्मीद कर रहे थे कि मन्ना डे इस उमर में भी कम से कम चार-छः गीत तो गाएँगे ही। लेकिन उन्होंने लगभग ढाई घंटे तक गाया और पच्चीस-तीस गीत गाए। सब लोगों ने नॉस्टेल्जिक अनुभूतियों के साथ, खुशी जताते हुए, तालियाँ बजाते हुए उन्हें सुना। मुझे भी बड़ा सुख मिला। मन्ना डे जैसे बड़े पाश्र्व गायक को सीधे सुनने का आनंद और संतोष हुआ।

रात नौ बजे कार्यक्रम समाप्त हुआ, भीड़ के साथ सीढि़याँ उतरते हुए मुझे ‘प्रसाधन’ लिखा देखकर ख्याल आया कि इस बीच फारिग हो लूँ। भीड़ भी छँट जाएगी और तब आराम से घर जा सकूँगा। मैं जाकर खड़ा हुआ ही था कि बगल में एक आदमी कुछ निढाल-सा, थके कदमों से आया और पेशाब करने लगा। मैंने उसकी तरफ देखा, वह रुआँसा हो रहा था। निगाह मिलने पर वह कुछ सकपका गया और नजर चुराने लगा। मैंने पूछा- ‘आपको कैसे लगे मन्ना डे? उनकी आवाज से लगता नहीं है न कि वे छियासी साल के हैं?’
यकायक वह आदमी रोने लगा। मैं घबरा गया। मुझे लगा कि शायद मैंने कुछ गलत बात कह दी। वह एक बाँह से आँसू पोंछने लगा। मैंने सोचा कि उसे ढाढ़स बँधाना चाहिए। जिप खींचकर मैं एक तरफ खड़ा हो गया कि जब यह इधर आए तो इससे सांत्वना के कुछ शब्द कहूँ। मैं खुद को कहीं न कहीं अपराधी समझ रहा था। वह जैसे ही पलटा मैंने कहा- ‘माफ करें, शायद मैंने कुछ ऐसी बात पूछ ली जो आपको अच्छी नहीं लगी।’
‘नहीं भाई, आपकी बात से कुछ नहीं हुआ। मुझे तो पहले से ही रोना आ रहा था।’ उसने भर्रायी आवाज में कहा।
मुझे आश्वस्ति हुई कि चलो, मेरी वजह से इसे कुछ नहीं हुआ।
‘जैसे ही आपने कहा कि लगता नहीं वे छियासी के हैं, मैं अपने आँसू रोक नहीं पाया।’
‘इसमें ऐसा क्या कह दिया मैंने?’
‘अब क्या बताऊँ आपको! इस उमर में, बुलंद आवाज में, पूरे पक्के सुरों में उनके गाने सुनते हुए दरअसल मुझे यह ख्याल सताने लगा कि एक दिन मन्ना डे.....।’ वह कुछ कहते-कहते रुक गया।
‘एक दिन मन्ना डे, क्या? क्या मतलब?’
‘अरे भाई, मुझे अचानक यह ख्याल आया कि एक दिन मन्ना डे इस दुनिया में नहीं रहेंगे। तबसे यह कुविचार मेरा पीछा कर रहा है। मैं इससे पीछा नहीं छुड़ा पा रहा हूँ।’

मुझे समझ नहीं आया कि इस भले आदमी से आखिर क्या कहूँ। इसकी बात पर हँस दूँ, इसे समझाऊँ या टाल कर चल दूँ। उस आदमी की मुद्रा गंभीर थी। वह किसी गहरी तकलीफ में दिख रहा था। मैंने विषयांतर करने के लिए, एक तरह से उसका ध्यान बाँटने के लिये कहा- ‘चलिए, नीचे चलते हैं, रेस्टॉरेंट में चाय पीते हैं। आपके पैन्ट्स की जिप खुली है।’ आखिरी वाक्य मैंने इस तरह कहा कि उसे बुरा न लगे। उसने अनमने मन से जिप खींची और बोला- ‘ठीक है, आप भी चाय पीना चाहते हैं तो चलिये।’
हम रेस्टाॅरेंट के एक शांत कोने की टेबुल की तरफ गए। वह अभी तक संयत नहीं हुआ था।
‘देखिए, आप यह मत समझिए कि मन्ना डे के लिए मैं ऐसा सोच रहा हूँ। बल्कि यह सोचना मुझ पर कितना भारी पड़ रहा है, मैं ही जानता हूँ।’
‘अब कुछ तो मैं भी जानता हूँ।’ मैंने मुसकराते हुए कहा। लेकिन उस पर इस परिहास का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
‘लगता है आप इस बात पर भावुक हो गए हैं, कुछ हद तक डिप्रेशन में आ गए हैं।’ कहते हुए मैंने सोचा कि शायद सहानुभूति से ही इस आदमी को उबारा जा सकता है।

घटनाक्रम ऐसा बनता गया कि मुझे इस अतिनाटकीयता में रुचि हो गई या कहूँ कि एक तरह से मैं फँस गया। और अब मैं घर जाने की बजाय यहाँ इस आदमी के साथ, जिसका नाम तक नहीं जानता, दो चाय का आॅर्डर देने के बाद बैठा हुआ था। मेरा कमरा पास में ही, पाँच मिनट की पैदल दूरी पर था। वह अभी भी गंभीर और उदास था। इस स्थिति में किसी औपचारिक परिचय के लेन-देन की गुंजाइश नहीं निकल रही थी।
‘जब उन्होंने गाया ‘फुलगेंदवा न मारो’, मैं मारे खुशी के झूम उठा। क्या तान थी, क्या उठान और इतनी गहरी, साफ-सुथरी आवाज कि कभी रेडियो या कैसिट पर न सुनी थी। इतनी उमर के बावजूद एक भी सुर गलत नहीं लगाया। और भाई, इसी दौरान मुझे यह दुष्ट ख्याल आ गया कि एक दिन मन्ना डे नहीं रहेंगे। इतना नायाब गायक हमारे बीच नहीं रहेगा, यह आवाज, यह गायकी नहीं रहेगी। इसकी वजह से मेरी यह खुशी गायब हो गई है कि मैंने मन्ना डे को सुना।’ उसने धीरे-धीरे, भरे हुए गले से कहा।
‘यह तो होगा ही। एक दिन हम सब नहीं रहेंगे। पहले भी महान कलाकार हुए हैं और आखिर उनकी भी उमर पूरी हुई। यह कितनी खुशी की बात है कि मन्ना डे आज और अभी हमारे बीच हैं। दुआ है कि वे शतायु हों।’ मैंने टेबुल पर रखे उसके हाथ को छूकर कहा। सोचा कि स्पर्श उसे राहत दे सकेगा।
वह खामोश रहा।
‘एक बार मैंने भी कुमार गंधर्व को सुनते हुए और बचपन में मुकेश का कोई गाना सुनते हुए सोचा था कि काश, ये लोग कभी न मरें। यह ख्याल जीवन में अपने प्रिय कलाकार को लेकर कभी न कभी सबके मन में आता ही है। लेकिन इसे लेकर इतना व्यथित होने की कोई बात नहीं है।’ मैंने उसे इस तरह भी दिलासा देने का प्रयास किया।
‘मैं जानता हूँ। मगर अभी कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ। मैं तो उनके गाने के बीच में उठकर, चीखकर कहनेवाला था कि मन्ना, अब मत गाओ, नजर लग जाएगी। मगर मन का लोभ तो यही था कि वे गाते जाएँ, बस, गाते जाएँ। और उसी बीच यह विचार जड़ जमाता चला गया कि चार साल बाद मन्ना डे नब्बे के हो जाएँगे। और आखिर एक दिन, सात साल बाद या दस साल बाद....।’ उसने खुद को रोने से रोका। इस तरह कि पास खड़े वेटर का ध्यान भी हमारी तरफ आकर्षित हो गया। मैंने वेटर को हाथ के इशारे से जताया कि कोई ऐसी-वैसी बात नहीं, दोस्तों के बीच की ही कोई छोटी-मोटी बात है।

मैंने सोचा कि कहीं इस आदमी ने ज्यादा शराब तो नहीं पी ली है। और इस वजह से ही यह अति भावुकता का शिकार हो गया है! तब तो इसे समझाना, इसके साथ वक्त जाया करना बेकार है। मैं भी किस प्रपंच में पड़ गया। आखिर मैंने पूछ ही लिया- ‘क्या आपने आज कुछ अल्कोहल लिया है?’ वह टेबुल पर दोहरा होते हुए मेरे पास अपना मुँह ले आया और गहरी साँस चेहरे पर छोड़ते हुए बोला- ‘लो, सूँघ लो। मैंने पिछले दस बरस से शराब नहीं पी।’
मुझे पसीने की और उसके मुँह की मिली-जुली तीखी, खट्टी गंध का अहसास हुआ।
‘साॅरी! मुझे इस तरह नहीं पूछना चाहिए था। लेकिन आपको इतना सेण्टीमेंटल देखकर लगा कि...।’
‘कोई बात नहीं। मुझे भी अपना मुँह आपके मुँह पर इस तरह नहीं लाना था लेकिन आपकी बात पर मुझे कुछ गुस्सा आ गया। हालाँकि मैं समझ सकता हूँ कि आप भले आदमी हैं और मन्ना डे को प्यार करते हैं। वरना मेरे रोने से, मेरे दुख से आप क्यों अपना रिश्ता जोड़ते!’
‘आप इस तरह से किसलिये दुखी हो रहे हैं? मन्ना डे की आवाज, उनके गाये गीत धरोहर के रूप में हमारे पास, हमारी यादों में हमेशा रहेंगे। अब तो सी.डी., डी.वी.डी. वगैरह जैसी चीजें भी हैं और कितनी म्यूजिक कंपनियाँ हैं जो मन्ना डे को ही नहीं बल्कि तमाम महान गायकों को हमारे लिए, आनेवाले लोगों के लिए बचाकर रखेंगी।’
‘खाक बचाकर रखेंगी। जरा खोजकर देखें। पुराने गीत ढूँढ़ने में पसीने आ जाते हैं। और मेरी चिंता तो यह भी है कि डेढ़ सौ साल बाद, दो सौ साल बाद मन्ना डे की आवाज कैसे सुन पाएँगे।’
मुझे हँसी आ गई।
‘अरे भाई, तीस-चालीस साल बाद तो हम दोनों ही नहीं रहेंगे, डेढ़ सौ-दो सौ साल बाद की परवाह आप क्यों कर रहे हैं!’
‘आप नहीं समझ सकते। मुझे लग रहा था कि शायद आप कुछ समझेंगे। कोई नहीं समझ सकता। ओह! मैं मन्ना डे को सुनने आया ही क्यों? इस तरह उन्हें साक्षात् सुनना, जिसे यहाँ सुनकर लगा कि कोई कंपनी आज तक उनकी आवाज ठीक से दर्ज ही नहीं कर पाई, उस आवाज को सुनना! मैंने यह खुला खजाना देखा ही क्यों? काश! कोई मुझसे कह दे कि मन्ना डे हमारे बीच इसी तरह बने रहेंगे, इसी आवाज के साथ।’ वह फिर बहक गया।

शायद उसे नर्वस ब्रेकडाउन जैसा कुछ हो गया था। मैं चुप रहा।
कुछ देर बाद उसने धीरे से अपनी आँखों को मला। वेटर ने चाय सर्व कर दी। संक्षिप्त शांति में हम चाय पीते रहे। चाय जैसे ही खतम हुई, वेटर बिल रख गया। उसने तुरंत बिल अपने कब्जे में लिया।
‘बिल इधर दीजिए। पैसे मैं दूँगा, चाय पीने का प्रस्ताव मेरा था।’ मैंने कहा।
‘नहीं, पैसे मैं ही दूँगा। वरना बाद में मुझे ऐसा लगेगा कि मैं कुछ नर्वस था, दुख में था, इसलिए सहानुभूति में आपने मुझे चाय पिला दी। यह ख्याल मुझे फिर परेशान करेगा।’
अजीब तर्क था। उसने पंद्रह रुपए दिए। बारह चाय के और तीन टिप मानकर।

हम बाहर निकल आए। उसने बताया कि पेड़ के नीचे, उधर अँधेरे कोने में उसका स्कूटर खड़ा है। ‘अब आपको ठीक लग रहा है न!’ मैंने पूछा।
‘हाँ। मैं शायद ज्यादा ही भावुक हूँ। मगर सच मानिए, जरूरत पड़ने पर मन्ना डे को मैं अपना खून, अपनी किडनी, अपना लिवर तक दे सकता हूँ। लेकिन मन्ना डे को यह बात मालुम होनी चाहिए ताकि वक्त-जरूरत आने पर वे किसी तरह का संकोच न करें। पता भर लग जाए। मुझे लगता है कि मैं मर जाऊँ, बल्कि हममें से बहुत से लोग मर जाएँ और मन्ना डे बच जाएँ तो सब ठीक हो जाएगा।’ वह बाढ़ के पानी में लकड़ी के पटिये की तरह बहने लगा।
‘हाँ, मन्ना डे के लिए तो कोई भी, कुछ भी कर सकता है।’ मैंने उसे शांत करने की नीयत से कहा।
‘आप भी कैसी बात करते हैं! इतने गायक, इतने कलाकार भूख से, गरीबी से, बीमारी से, उपेक्षा से मर गए, किसी ने कुछ किया? मैंने तक नहीं किया। वक्त आने पर आदमी अपने माँ-बाप तक के लिये कुछ नहीं करता। कलाकार, वैज्ञानिक बंद कमरों में सड़ जाते हैं, पागल हो जाते हैं, आत्महत्या कर लेते हैं या जानलेवा बीमारियों से मर जाते हैं। क्या आप नहीं जानते? मन्ना डे के लिए ही अभी कौन क्या कर रहा है? लेकिन अब उनके लिए मैं कुछ भी, सच में कुछ भी करना चाहता हूँ।’
वह फिर किसी गहरी घाटी में उतर गया।
जानबूझकर मैं चुप रहा। कि बात बढ़ाने से इस आदमी का मानसिक उत्ताप बढ़ता ही जाएगा। स्कूटर के पास जाकर वह अचानक पलटा और करीब आकर, कंधे पर हाथ रखकर बोला- ‘आपको क्या लगता है, आयोजकों ने मन्ना जी को दो-तीन लाख रुपए भी दिए होंगे?’
‘नहीं, मुझे इसका अंदाजा नहीं।’ मैंने कुछ घबराहट में और कुछ उसे दूर हटाने के भाव से जवाब दिया।
‘मैं जानता हूँ, नहीं दिए होंगे। जबकि हर फालतू जगह पैसा पानी की तरह बहाया जाता है। खैर, मन्ना डे को इससे क्या फर्क पड़ता है! मेरी तो बस एक ही तमन्ना है कि मन्ना डे को कभी कुछ न हो!’
‘जरूर। ऐसा ही होगा। आपकी दुआ काम आएगी।’
‘लेकिन मैं जानता हूँ। आप भी जानते हैं कि एक दिन मन्ना डे....। ओफ्फो! यह ख्याल मेरी जान लेकर ही मानेगा।’ निराशा में उसने अपनी उँगलियों को चटकाया।
‘अरे भाई, आपका नाम क्या है? आप क्या करते हैं? कहाँ रहते हैं??’ मैंने एक साथ सवाल पूछे ताकि परिचय भी हो जाए और उसका ध्यान भी इस बात से हट जाये, जिस पर वह बार-बार अटक जाता है।
‘आपकी गाड़ी कहाँ है?’ बदले में उसने पूछा। मैंने बताया कि यहीं पास में रहता हूँ, पैदल आया हूँ, पैदल जाऊँगा।
‘नहीं, मैं आपको छोड़ूँगा।’ इस पर मैंने आग्रहपूर्वक समझाया कि दरअसल मेरा कमरा एकदम करीब है, यह सामने काॅलोनी में। पैदल लायक ही दूरी है।
तब उसने स्कूटर स्टार्ट किया और बोला- ‘आप मुझे इसी रूप में जानें कि मैंने एक दिन मन्ना डे को सुना। मेरी यही पहचान काफी है। और देखो, अब मैं मुस्करा सकता हूँ।’ 
उसके लहराते स्कूटर को दो पल मैं देखता रहा। मैंने सोचा, अजीब पागल आदमी से पाला पड़ा था। उससे छूटकर मुझे एक तरह की राहत भरी खुशी का अनुभव हुआ।

कमरे का ताला खोलकर भीतर घुसते हुए मैं मन्ना डे के गानों की पंक्तियाँ गुनगुनाने लगा। मन्ना डे की आवाज और गीतों का जादू तो मुझ पर भी था। इस घटनाक्रम के बाद अब मैं इस बेहतरीन, मन्ना डे की आवाज से भरी शाम की स्मृति में अपनी तरह से वापस जाना चाहता था। बेसिन पर हाथ धोकर मैंने टिफिन उठाया। टिफिन खोलने के पहले अलमारी में से खोजकर मन्ना डे के गानों की कैसिट निकाली, उसे ‘टू इन वन’ पर लगाया। फिर टिफिन खोलकर खाना खाने बैठ गया। ‘हँसने की चाह ने, कितना मुझे रुलाया है.....।’
मन्ना डे की आवाज गूँजती रही।
अचानक ही मुझे रुलाई आ गई। मैंने खुद को बहुत रोका। मगर बेकार। मुझसे फिर खाना भी नहीं खाया गया।
मैं वहीं बिस्तर पर लेट गया। बत्ती बुझा दी।
मुझे रह-रहकर वह आदमी याद आने लगा और उसका वह ख्याल कि एक दिन मन्ना डे.....। मैंने उस रात में पहली बार, उस ख्याल की मारक बेचैनी को महसूस किया।
रो लेना भी एक दवा है। स्वस्थ आदमी ही इस तरह रो सकता है। कमरे के अँधेरे में इस तरह सोचते हुए, मैंने खुद को सांत्वना देने की असफल सी कोशिश की।
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शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

रास्‍ते की मुश्किल


रास्ते की मुश्किल

आप मेज को मेज तरह और घास को घास की तरह देखते हैं
इस दुनिया में से निकल जाना चाहते हैं चमचमाते तीर की तरह
तो मुश्किल यहाँ से शुरू होती है कि फिर भी आप होना चाहते हैं कवि

कुछ पुलिस अधीक्षक होकर, कुछ किराना व्यापारी संघ अध्यक्ष होकर
और कुछ तो मुख्यमंत्री होकर, कुछ घर-गृहस्थी से निबटकर 
बच्चों के शादी-ब्याह से फारिग होकर होना चाहते हैं कवि 
कि जीवन में कवि न होना चुनकर भी वे सब हो जाना चाहते हैं कवि

कवि होना या वैसी आकांक्षा रखना कोई बुरी बात नहीं
लेकिन तब मुमकिन है कि वे वाणिज्यिक कर अधिकारी या फूड इंस्पेक्टर नहीं हो पाते
जैसे तमाम कवि तमाम योग्यता के बावजूद तेहसीलदार भी नहीं हुए
जो हो गए वे नौकरी से निबाह नहीं पाए
और कभी किसी कवि ने इच्छा नहीं की और न अफसोस जताया
कि वह जिलाधीश क्यों नहीं हो पाया
और कुछ कवियों ने तो इतनी जोर से लात मारी कि कुर्सियाँ जाकर गिरीं कोसों दूर

यह सब पढ़-लिखकर, और जानकर भी, हिन्‍दी में एम ए करके, विभागाध्यक्ष होकर
या फिर पत्रकार से संपादक बनकर कुछ लोग तय करते हैं 
                                                 कि चलो, अब लिखी जाए कविता
और जल्दी ही फैलने लगती है उनकी ख्‍याति
कविताओं के साथ छपने लगती हैं तस्वीरें
फिर भी अपने एकांत में वे जानते हैं और बाकी सब तो समझते ही हैं
कि जिन्हें होना होता है कवि, चित्रकार, सितारवादक या कलाकार
उन्होंने गलती से भी नहीं सोचा होता है कि वे विधायक हो जाएँ या कोई ओहदेदार
या उनकी भी एक दुकान हो महाराणा प्रताप नगर में सरेबाजार 

तो आकांक्षा करना बुरा नहीं है
यह न समझना बड़ी मुश्किल है कि जिस रास्ते से आप चले ही नहीं
उस रास्ते की मंजिल तक पहुँच कैसे सकते हैं।
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रविवार, 1 अप्रैल 2012

मूर्खताऍं

करीब 16 साल पहले लिखी यह कविता 'अनंतिम' शीर्षक संकलन में संग्रहीत है।
आज अनायास ही पहली अप्रैल को इसकी स्‍मृति आ गई। हाजिर है।

मूर्खताऍं

मूर्खताऍं हमारी सहज बुद्धि का चमत्‍कार हैं
उन्‍हें सीखना नहीं पड्ता
और संभव भी नहीं कि उन्‍हें सिखाया जा सके

आज की बुद्धिमानियॉं
कल पता चलता है कि हमारी सर्वोत्‍तम मूर्खताऍं थीं
फिर ध्‍यान देने पर लगता है
यह जीवन टिका हुआ है मूर्खताओं पर ही

उनके लिए किसी प्रसंग की जरूरत नहीं
लेकिन वे प्रसंगों को स्‍मरणीय बना देती हैं
किसी को सुनाने के लिए याद करने पर
वे मुश्किल से ही आती हैं याद
क्‍योंकि वे इतनी अधिक हो चुकी होती हैं
कि चुनना आसान नहीं

उन पर रोने से कोई फायदा नहीं
हँसना तो और भी कठिन
वे अपने आप में कम अजीब नहीं होतीं
और अकसर हमें विपदाओं में से निकाल लाती हैं
हालॉंकि विपदाओं में डालने में भी उनकी ही भूमिका होती है

वे हमारी दिनचर्या का उपसर्ग हैं
छोटी-मोटी मूर्खताओं का तो हमें पता ही नहीं चल पाता
हम उनके इतने आदी हैं
कि अकसर ही हम एक-दूसरे से
उनकी आशा करते हैं।

मंगलवार, 6 मार्च 2012

चौराहे पर लोहार

नरेन्‍द्र जैन की कविताऍं

अभी आधार प्रकाशन,एस सी एफ 267, सेक्‍टर 16, पंचकूला, 134 113 हरियाणा से वरिष्‍ठ कवि नरेन्‍द्र जैन का सातवां कविता संग्रह 'चौराहे पर लोहार' प्रकाशित हुआ है। मध्‍यम और निम्‍नवर्गीय जीवन के दैनिक प्रसंगों से नरेन्‍द्र जैन की कविता अपना उत्‍स ग्रहण करती रही है। आज जब हिन्‍दी कविता का अधिकांश कलावाद को प्रगतिशील मुखौटे और अभिनय के साथ अपने भीतर सुखद जगह देने में व्‍यस्‍त दिखता है और उस कविता से अपने समाज और वृहत्‍तर यथार्थ की दृश्‍यावली लगभग विलुप्‍त है, नरेन्‍द्र जैन उन थोड़े से कवियों में हैं जिनकी कविता वंचित, उपेक्षित और असहाय वर्ग के लोगों को, उनके कार्य व्‍यापार को, विडंबनाजन्‍य और विवश फाकामस्‍ती को जगह देती है। भूमण्‍डलीकरण को वे अपने कस्‍बे के भूखण्‍ड में घट रही घटनाओं के माध्‍यम से चिन्हित करते हैं। उनकी कविता एकवचनीय स्‍थानीयता को बहुवचनीय विपुलता से भर देती है और विशाल कांपती हुई परिधि को जैसे केन्‍द्रीयता प्रदान करती है। नरेन्‍द्र अपने चिर परिचित मुहावरे में ही अपनी बात कहते आ रहे हैं,कथ्‍य की विविधता पर ही उन्‍हें कहीं अधिक विश्‍वास है बजाय शिल्‍पाश्रित होने के।
इस संग्रह से शीर्षक कविता सहित दो कविताऍं, यहॉं।

चौराहे पर लोहार

विदिशा का लोहाबाजार जहॉं से शुरू होता है
वहीं चौराहे पर सड़कें चारों दिशाओं की ओर जाती हैं
एक बॉंसकुली की तरफ
एक स्‍टेशन की तरफ
एक बस अड्डे
और एक श्‍माशनघाट

वहीं सोमवार के हाट के दिन
सड़क के एक ओर लोहार बैठते हैं
हँसिये,कुल्‍हाड़ी,सरौते
और खुरपी लेकर
कुछ खरीदने के लिए हर आने-जानेवाले से
अनुनय करते रहते हैं वे
शाम गये तक बिक पाती हैं
बमुश्किल दो-चार चीजें

वहीं आगे बढ़कर
लोहे के व्‍यापारी
मोहसीन अली फखरुद्दीन की दुकान पर
एक नया बोर्ड नुमायां है
'तेज धार और मजबूती के लिये
खरीदिये टाटा के हँसिये'

यह वहीं हँसिया है टाटा का
जिसका शिल्‍प वामपंथी दलों के चुनावी
निशान से मिलता जुलता है
टाटा के पास हँसिया है
हथौड़ा है, गेहूँ की बाली और नमक भी है

चौराहे पर बैठे लोहार के पास क्‍या है
एक मुकम्मिल भूख के सिवा।
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विदिशा डायरी सीरीज से नवीं कविता

जिन घरों में बड़े भाई की कमीज
छोटे भाई के काम आ जाती है
इसी तरह जूते, चप्‍पल और पतलून तक
साल दर साल उपयोग में आते ही रहते हैं
वे कभी कभार आते हैं बांसकुली
पतलून कमर से एक इंच छोटी करवाने
या घुटने पर फटे वस्‍त्र को रफू करवाने

अक्‍सर इन घरों में यदि पिता हुए तो
वे बीसियों बारिश झेल चुकी जैकिट पहनते हैं
और फलालैन की बदरंग कमीज
जिन्‍हें सूत के बटन भी अब मयस्‍सर नहीं होते

रफूगर की दुकान से
दस कदम आगे रईस अहमद
पुराने वाद्ययंत्रों के बीच बैठे
क्‍लेरनेट पर बजाते रहते हैं कोई उदास धुन

यह धुन होती है कि
अपने चाक वक्‍त को रफू कर रहे होते हैं वे।
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शनिवार, 28 जनवरी 2012

पसीने की गंध

पिछले दो दशकों से रवीन्‍द्र व्‍यास मेरे प्रिय हैं। दोस्‍ती मेरे इंदौर प्रवास में लिखने पढ़ने की वजहों से हुई। और जल्‍दी ही मामला पारिवारिक हदों तक हुआ। और अब हम एक-दूसरे को लगातार 'मिस' करते हुए, अलग-अलग शहरों में रह रहे हैं।
रवि कम लिखता है, महत्‍वाकांक्षा उसे जैसे छू भी नहीं गई है। उसे प्रेरित करने के लिए कम से कम एक क्विंटल प्रेरणा चाहिए। फिर भी वह अपनी रौ में लिखता है। जिद करके पेंटिंग सीखी और अर्जित की। उसने जैसे हम सबको बताया कि प्रतिभा से कहीं अधिक आकांक्षा,निश्‍चय और प्रतिबद्धता मायने रखती है। जलरंग माध्‍यम में, एक ही रंग में जो उसने काम किया है वह विशाल हरे, नीले, लाल चुंबक की तरह खींचता है। वह उतना बड़ा चुंबक तो है ही जितना कि कोई विशाल ग्रह हो सकता है। उसके चित्रों में संगीत और कविता का रंग शामिल है।
बहरहाल, उसके कम लिखे हुए गद्य में भी काव्‍य तत्‍व निवास करते हैं और उस गद्य को एक नयी, अप्रतिम हार्दिकता प्रदान करते हैं। उसे वाक्‍य लिखने की तमीज है। वह जीवन के उत्‍स से अपना गद्य संभव करता है। विजुअल्‍स बनाता है और मार्मिक गद्य हमारे सामने होता है।
रवि पर और उसके साथ बिताए समय पर,हमारे सैंकड़ों दिनों और रातों पर मैं कुछ ज्‍यादा लिख सकता हूं, लिखना चाहता हूं लेकिन अभी मैं उसके ब्‍लॉग http://ravindravyas.blogspot.com/ में से ही एक छोटा सा टुकड़ा यहां रख रहा हूं। यह पुनर्प्रकाशन है लेकिन यह आनंद को प्रसारित करना भी है।



जिंदगी से बेदखल पसीने की गंध

रवीन्‍द्र व्‍यास


मेरे पिता के पसीने की गंध अब भी मेरे मन में बसी है। वे हमेशा पैदल चलते थे और उन्होंने कभी साइकिल तक नहीं चलाई। उनके बचपन का एक फोटो मैंने अब तक संभाल कर रखा है जिसमें वे तीन पहिए की साइकिल पर बैठे हैं। उन्होंने मुझे बहुत कम गोद में उठाया। संयुक्त परिवार में होने के कारण माँ हमेशा रसोईघर में रहती और मुझे मेरी बड़ी बहनें संभालती।
मुझे याद है, बचपन में खेलते हुए जब मेरे दाहिने पैर के अँगूठे का नाखून उखड़ गया तो पिता ने मुझे गोद में उठाया और सिख मोहल्ले के डॉक्टर सिंह के क्लिनिक ले गए क्योंकि उस दिन शायद डॉक्टर फाटक नहीं थे जो हमारे परिवार के सभी सदस्यों का इलाज करते थे।
मैंने रोते हुए पिता के कंधे पर अपना सिर रखा था और दर्द को सहते हुए मुझे पिता के पसीने की गंध भी आ रही थी। उसमें सरसों के तेल की गंध भी शामिल थी क्योंकि पिता कसरत के पहले मालिश किया करते थे।
हमारा घर बहुत छोटा था। बहनें जब कभी बाहर जाती, मेरी पीठ के पीछे कपड़े बदल लिया करती थीं। मेरी पीठ उनके लिए छोटा-सा कमरा थीं। कई बार जल्दबाजी में वे कपड़े ऐसे पटकती कि वे मेरे सिर पर गिरते थे। उनके पसीने में राई-जीरे से लगे बघार की गंध होती थी। उनके पसीने की गंध मैं भूला नहीं हूँ।
और दुनिया में कौन ऐसा बच्चा होगा जो अपनी माँ के पसीने की गंध को भूल सकता है।
और आज खुशबू का करोड़ों का कारोबार है, जिंदगी से पसीने की गंध को बेदखल करता हुआ। एक विज्ञापन बताता है कि एक खुशबू में इतना आकर्षण, सम्मोहन और ताकत है कि दीवारों में लगी पत्थर की हूरें जिंदा होकर चुपचाप मंत्रमुग्ध-सी उस बाँके युवा के पीछे चल पड़ती हैं जिसने एक खास तरह के ब्रांड की खुशबू लपेट रखी है।
अब तो हर जगह को नकली खुशबूओं ने घेर रखा है। शादी हो या कोई उत्सव, या चाहे फिर कोई-सा प्रसंग नकली खुशबुओं का संसार पसरा पड़ा है। जिसको देखो वह बाजार में सजी नकली खुशबू में नहाया निकलता है। मजाल है जो कहीं से पसीने की गंध आ जाए। और अब तो खुशबूएँ कहाँ नहीं हैं। वे हमारी गोपन जगहों पर भी पसरी पड़ी हैं क्योंकि अब बाजार में कंडोम भी कई तरह की खुशबू में लिपटे मिलते हैं।
मैं जहाँ कहीं, किसी कार्यक्रम में जाता हूँ तो लोग नाना तरह की खुशबू में नहाए मिलते हैं। इन समारोह में कई ऐसे दृश्य भी दिखाई देते हैं जहाँ पिता अपने बच्चों को ढूँढ़ रहे हैं, माँएँ अपने बच्चों को गोद में बैठाकर आईसक्रीम खिला रही हैं या फिर बहनें अपने छोटे भाई का हाथ पकड़कर उसे नूडल्स के स्टॉल की ओर ले जा रही हैं। और ये सब नकली खुशबू में नहाए खाते-पीते खिलखिला रहे हैं।
खुशबू के फैले इस संसार में क्या उस बच्चे को अपने पिता, माँ या बहन के पसीने की गंध की याद रहेगी?

बृहस्पतिवार, 19 जनवरी 2012

जैसे विरोध करने की कोई उम्र होती है

इधर लगातार एक अनुभव हो रहा है, प्रत्‍यक्ष हो रहा है कि हमारे अनेक प्रगतिशील, जनवादी लेखक दक्षिणपंथी संस्‍थाओं, सत्‍तासीन लोगों के साथ मंचासीन होने में कोई परहेज नहीं बरत रहे हैं। बल्कि लगता है कि वे इससे गौरवान्वित, सम्‍मानित और प्रसन्‍न हैं। और इसके लिए अपने तर्क भी गढ़ चुके हैं। इनमें से अनेक वे अग्रज हैं जो हमें प्रतिबद्धता, संघर्ष,प्रतिरोध, वामपक्ष और प्रतिवाद का पाठ पढ़ाते रहे हैं। ये लोग तय कर रहे हें कि यह कविता, जो करीब एक दशक पहले लिखी गई थी, वह कहीं अधिक प्रासंगिक बनी रहे, उसे ये दुखद रूप से जैसे सिद्ध कर रहे हैं।


जैसे विरोध करने की कोई उम्र होती है

बेकार है इस उम्र में किसी तरह का विरोध करना
एक बेटी अभी तक है अनब्याही
जब उम्र थी कई लोगों से ले ली बुराई
अब ठीक यही हिलमिल कर गुज़ारें जीवन
क्या पता कब क्या मुश्किल आए
अस्पताल भी जाना पड़ सकता है आधी रात में
अपने बच्चे ही नहीं सुनते जब कोई बात
तब क्या परिषदों, अधिकारियों, अकादमियों से टकराना
क्या नारेबाजी और क्या भृकुटि को तलवार बनाना
मुद्दा ठीक है लेकिन जिसके खिलाफ़ है
उससे मेरे अड़तीस साल पुराने संबंध
समर्थन भी तो मित्रता का ठहरा एक आधार
फिर भी देता मैं तुम सबका साथ लेकिन देखो
अब तो मुझे खाँसी भी आती है बहुत
हाथ काँपते हैं ज्ञापन पर दस्तखत भी मुश्किल
इधर अब तो मेरी प्रतिष्ठा भी यही हो चली है:
वरिष्ठ हैं, चुप रहते हैं, ग़म खाते हैं।
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सोमवार, 26 दिसम्बर 2011

ऋणग्रस्‍तता

आईसाहित्‍य http://bit.ly/w3ij4v पर एक साक्षात्‍कार है। http://bit.ly/w3ij4v
इसका एक अंश यहां।


प्रश्‍न: कविता को चुनने के पीछे कोई विशेष कारण , प्रभाव ? एक कवि के तौर पर आपके प्रेरणा स्त्रोत कौन कौन से रचनाकार रहे जिन्हें आपने अपने शुरुआती दिनो में पढ़ा और उनसे बेहद प्रभावित हुये ?

उत्‍तर: मैं कविता ही लिख सकता था। एक संवेदना, एक विचार और एक दृश्य मुझ पर जैसे झपट्टा मारता था। उस आवेग का प्रतिफलन कविता में होता था। रामचरितमानस की अनेक भावप्रवण और उपमाओं, रूपकों से भरी पंक्तियों का प्रारंभ में मेरे ऊपर काफी प्रभाव रहा है। प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ते हुए वामपंथ और माक्र्सवाद से गहरा परिचय हुआ।

यों एक रचनाकार पर अपने आसपास की हर चीज का, हर शब्द का और हर ध्वनि का प्रभाव पड़ता है। वह ऋणग्रस्‍त ही है। वह दस हजार तत्वों से मिलकर बनता है। रोज बनता रहता है। उसे किसी एक दो प्रभावों में न्यून नहीं किया जा सकता। सबसे ज्यादा प्रभाव तो अपने बचपन का, स्मृतियों का, अपनी असहायताओं, जिज्ञासाओं और असमर्थताओं का होता है। जैसे एक कवि कविता लिखते हुए इन सब पर विजय पाना चाहता है या इन्हीं में घुलकर कोई नया पदार्थ बन जाना चाहता है। मुझे लगता है कि एक कहानीकार, उपन्यासकार या आलोचक की तुलना में कवि इस संसार में कहीं अधिक मिस फिट और अवसादग्रस्त व्यक्ति होता है। अधिक संवेदित, स्पर्शग्राही, और कहीं अधिक भावुक और विश्वासी। एक कवि बार-बार धोखे खा सकता है, एक कवि को किसी अन्य रचनाकार की तुलना में कहीं अधिक आसानी से ठगा जा सकता है। यह उसकी कोई प्रशंसा, निंदा या प्रशस्ति नहीं है, बस एक स्वभाव और बनावट पर ध्यानाकर्षण है। हालाँकि सजग, चतुर और चालाक कवियों की भी उपस्थिति हो सकती है लेकिन मैं उन्हें आपवादिक मानता हूँ।

प्रश्‍न: आपकी अतिक्रमण (2002) कविता संग्रह के बाद आपका एक गद्य इच्छाए (2008) प्रकाशित हुआ। क्या इस बीच के समय को आपने विशेष रूप से गद्य (कहानियो) को दिया ? आप गद्य हमेशा से लिखते थे लेकिन आपने अचानक से इन्हें प्रकाशित करने का निर्णय कैसे लिया ? क्या लिखते समय आप प्रकाशन या किसी निश्चित समय में इसे पूरा करने के बारे में सोचते हैं?

उत्‍तर: मैं विनम्रता लेकिन दृढता से कहना चाहता हूँ कि कहानियाँ मैंने इसलिए लिखीं कि मैं पिछले दस-पंद्रह साल की अधिसंख्‍य हिंदी कहानियों के गद्य से बेहद निराश था। उनकी कृत्रिमता, नाटकीयता, इतिवृत्तामत्कता, अलौकिकता, इतिहास की कोई घटना या दुर्लभ बीमारियों के संदर्भ से बनाया गया कथासार, उनकी स्थूलता, विद्रूपता, शिल्प की अतिरिक्त सजगता, महीनता, काम चित्रावली और बौद्धिकता से मैं, अपनी तरह का एक पाठक, थक गया था। वे बहुत से शब्दों से बनी हुई विशाल, बड़बोली कहानियाँ थीं जिन्हें लिखनेवाला किसी उच्चतर जगह पर बैठा सृष्टा था। मुझसे वे पढ़ी भी नहीं जाती थीं। उनमें सब कुछ था बस सहजता, संबंध, जीवन का उत्स, सच्ची निराशा, अपराधबोध, मार्मिकता और अवसाद गायब था। वे महान कहानियाँ थीं और उनमें साधारण चीजें, रोजमर्रा का जीवन और आपाधापी अनुपस्थित थी। उनमें गद्य का एक अच्छा, स्वाभाविक पैराग्राफ खोजने पर भी नहीं मिलता था। यद्यपि ढर्रे में लिखा गया विपुल गद्य। प्रसंगों और घटनाओं के लिए आविष्कृत बरसों पुराना बासी गद्य। एक अच्छा वाक्य खोजने के लिए, कथा में जीवन, उत्साह, आलोचना, अस्वीकार और स्क्रीनिंग के लिए मुझे एक चौथाई सदी पीछे, ज्ञानरंजन के पास जाना पड़ता था। मैं महज अपना एक प्रतिवाद रखना चाहता था। एक शिकायत और एक इच्छा। मैं आलोचक की तरह यह काम करने में समर्थ नहीं था इसलिए मेरे पास इसका कोई सर्जनात्मक उपाय ही मुमकिन था। मैं नहीं कह सकता कि क्या कुछ मैं कर पाया लेकिन उसे एक रचनात्मक आकांक्षा और असहमति की तरह भी देखा जा सकता है।

प्रश्‍न: अपनी नये कविता संग्रह “ अमीरी रेखा” के बारे में कुछ बताइये । इसके शीर्षक के पीछे भी गहरी सामाजिक समस्या का अनुभव होता हैं । इस कविता संग्रह में आपकी किस तरह की कविताओ का संग्रह हैं? आज के समय आर्थिक विषमता, भ्रष्टाचार , कमजोर होता लोक तंत्र और हमारे सामाजिक जीवन में संस्कृति व सभ्यता का पतन कुछ बुनियादी मुद्दे हैं तो क्या ये कविता संग्रह इन सब को सामने लाने की कोशिश हैं क्योंकि ये संग्रह आपका उस समय आया हैं जब वाकई हर जगह इन समस्याओ पर क्रोध हैं ।

उत्‍तर: किसी कालखंड में लिखी कविताएँ अपने समय और समाज से प्रतिकृत होती ही हैं। अमीरी की रेखा कोई हो नहीं सकती और उसकी पड़ताल करना मुश्किल है। वह प्रवृत्तियों में, अमानुषिकता और पूँजीवादी विचार में कहीं खोजी जा सकती है। और ऐसे तमाम प्रत्यय हैं, विडंबनाएँ और विषमताएँ हैं जो इधर समाज में बढ़ती जा रही हैं लेकिन उन पर विमर्श गायब है। बहस के, विचार के गलियारों से भी वे बहिष्कृत हैं। मुझे अपनी प्रतिबद्धताओं के चलते ये सब चीजें कहीं अधिक विचारणीय लगती हैं, संवेदित करती हैं, परिचालित करती हैं। याद रखने की बात है कि सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिकता, समानता और समाजवाद की चाह अभी अप्रासंगिक नहीं हुई है। इन सबको एक ग्लोबल ओट में रखा जा रहा है।